INFLIBNET को बहु क्षेत्रीय नेटवर्क;
3. प्रत्येक विषय में अनेक सेक्टरल सूचना केन्द्र, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के चार सूचना केन्द्र- कला, विज्ञान, यान्त्रिक और मानविकी विषयों में स्थापित किये गये हैं। और सात NISSAT और राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं जैसे DESIDOC, IARI, INSDOC आदि को सम्मिलित किया गया है।4. 100 विश्वविद्यालयीन और शोध तथा विकास संस्थानों से सम्बद्ध पुस्तकालयों को Document Resource Centres के रूप में नामांकित और विकसित किया जा रहा
5. 184 विश्वविद्यालयीन, 23 मान्य विश्वविद्यालयीन, 6100 महाविद्यालयीन पुस्तकालय और 200 से भी अधिक अन्य संस्थानों के पुस्तकालय इस संगठन से सम्बद्ध हो गये हैं। विश्वविद्यालयीन, 50 स्नातकोत्तर महाविद्यालयीन पुस्तकालयों और 200 शोध तथा विकास संस्थानों से सम्बद्ध पुस्तकालयों में 400 Ground terminals की स्थापना की गई है।
INFLIBNET को बहु क्षेत्रीय नेटवर्क; के रूप में नियोजित किया जा रहा है जो निम्नांकित सेवायें प्रदान करेगा सेवाएँ (Services) ।
1. सूची आधारित सेवायें जिसमें सहभागी सूचीकरण, संघीय सूचीकरण, पुस्तकों, आनुक्रमिक (Serials) और शोध- प्रबन्धकों (Theses) की सूची-उत्पादन और Online Catalogue Access सम्मिलित हैं।
2. डाटा आधारित सेवायें जिसमें ग्रन्थ सन्दर्भ सूचीय (Bibliographic) डाटा आधारित सेवा, सामयिक अभिज्ञता सेवा (Current Awareness Service=CAS), चयनित सूचना प्रसारित सेवा (Selective Dissemination of Information=SDI), और गैर ग्रन्थ-सन्दर्भ-सूचीय (Non Bibliographic) डाटा आधारित सेवायें सम्मिलित हैं। 3. ग्रन्थ प्रदाय सेवा जिसमें Fax और Non-Fax के द्वारा ग्रन्थ प्रदाय सम्मिलित हैं। 4. संचरण आधारित सेवा जिसमें सन्देशों के स्थानान्तरण और सम्प्राप्ति के लिये Bulletin Board Service सम्मिलित हैं।
11.4. स्थानीय क्षेत्र नेटवर्क (Local Area Network) अथवा नगरीय पुस्तकालय नेटवर्क (City Library network)।
NISSAT, भारत सरकार द्वारा बड़े नगरों जैसे कोलकाता, दिल्ली, मद्रास और पुणे आदि में पुस्तकालय नेटवर्क को बढ़ाया गया है जिनके नाम क्रमश: CALIBNET, DELNET, MALIBNET और PUNENET हैं। मुम्बई, नागपुर, हैदराबाद, बंगलौर आदि बड़े नगरों में इस प्रकार के स्थानीय नेटवर्स स्थापित करने के प्रस्ताव विचाराधीन है। इन नेटवर्क्स का उद्देश्य महानगरीय क्षेत्र के समस्त पुस्तकालयों को सम्बद्ध करना और उनके संसाधनों को एकत्रित करना है। 12. अन्तर्राष्ट्रीय पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण यूनेस्को (UNESCO),इफला (IFLA), एफ. आई. डी. (FID) आदि अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों ने अन्तर्राष्ट्रीय संसाधन सहभागीकरण हेतु प्रयास किये हैं। Universal Availability of Publications(UAP) इफला का एक ऐसा ही कार्यक्रम है। यह इस प्रकार अवधारणा है कि समस्त प्रकाशन, जहाँ कहीं और जब भी प्रकाशित होते हैं किसी को और कहीं भी जिसको उनकी आवश्यकता है, उपलब्ध किये जायें। Universal Bibliographical Control, UNISIST का पूरक है। इस अन्तर्राष्ट्रीय प्रायोजना को यूनेस्को द्वारा विभिन्न संगठनों दारा प्रदत्त अन्तर्राष्ट्रीय वाङ्गमय सेवा को बढ़ाने और समन्वित करने के लिये प्रायोजित किया गया है। इसी प्रकार सहकारी ग्रन्थार्जन की अनेक अन्तर्राष्ट्रीय योजनाओं के कई उदाहरण दिये जा सकते हैं। ऐसा एक उदाहरण है स्केन्डिया योजना (Scandia Plan)।13. सारांश
रंगनाथन ने प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ सूत्रों की सम्पूर्ण सन्तुष्टि के लिये, पुस्तकालय संसाधनों का सहभागीकरण नितान्त आवश्यक है। संसाधन सहभागीकरण के अनेक स्वरूप हैं। सर्वाधिक आधुनिक अवधारणा है पुस्तकालय नेटवर्क। कोई भी सहकारी कार्यक्रम तभी सफल रह सकता है जब तक सम्मिलित होने वाले पुस्तकालय उसको लाभकारी पाते हैं। इस प्रकार की किसी भी योजना की सफलता एक बड़ी सीमा तक ग्रन्थालयियों के सहयोग करने की इच्छा पर निर्भर करती है। राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की अनेक योजनायें कार्यरत हैं जिनमें भारत में सर्वाधिक विशाल और उल्लेखनीय योजना है - INFLIBNET 1
14. अभ्यासार्थ प्रश्न |
1. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण से क्या तात्पर्य है?
भारत के सन्दर्भ में इसकी आवश्यकता और उपयोगिता का वर्णन कीजिये। पुस्तकालय विभिन्न स्तरों पर किस प्रकार अपने संसाधनों का सहभागीकरण कर सकतेपुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण के विभिन्न स्वरूपों की चर्चा कीजिये। 4. आप पुस्तकालय संसाधन-सहभागीकरण नेटवर्क से क्या समझते हैं? इस सन्दर्भ में भारतीय परिदृश्य की चर्चा कीजिये। 5. निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखिये:
a. सहकारी और केन्द्रीकृत ग्रन्थार्जन b. अन्तरापुस्तकालयीन आदान c. अन्तरापुस्तकालयीन निक्षेप और विनिमय
d. इन्फ्लिबनेट (INFLIBNET) 15. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रन्थ सूची 1. अग्रवाल, श्याम सुन्दर, पुस्तकालय तथा समाज, जयपुर आर.बी.एस.ए. पब्लिशर्स,
| 1994 2. Kent Allen, Ed, Resource Sharing in Libraries. 1974 3. Krishan Kumar , Library Organization. 1993 4. Mahajan, S G , Resource Sharing and Networking of Libraries in
India : (In University News. V.30. No. 35. Aug.1992. P 79-86)
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इकाई- 14: उपयोगकर्ताओं का अध्ययन, अवधारणा,आवश्यकता और स्वरूप (User's Studies: Concept, Need and Form) उद्देश्य
इस इकाई के निम्नलिखित उद्देश्य है
1. उपयोगकर्ता अध्ययन की अवधारणा से परिचित कराना, 2. उपयोगकर्ता अध्ययन की आवश्यकताओं से परिचित कराना, 3. उपयोगकर्ता अध्ययन की उपयोगिता के बारे में बताना, एवं। 4. इस सम्बन्ध में बताना कि उपयोगकर्ता की सूचना संकलन सम्बन्धी आदतों औरआवश्यकताओं का आकलन करने के लिये कौन सी विधियों को अपनाया जाये?। । संरचना
1. विषय प्रवेश 2. उपयोगकर्ता समुदाय 3. उपयोगकर्ताओं के विभिन्न वर्ग और उनकी सूचना सम्बन्धी आवश्यकतायें 4. उपयोगकर्ता अध्ययन की आवश्यकता 5. उपयोगकर्ता अध्ययन की उपयोगिता 6. उपयोगकर्ता अध्ययन विधियाँ 6.1 प्रत्यक्ष विधियाँ
6.1.1. पुस्तकालय सीमा के अन्दर जनसम्पर्क
6.1.2. पुस्तकालय सीमा के बाहर जनसम्पर्क
6.2. अप्रत्यक्ष विधियाँ
6.2.1. पंजीयन पत्रकों का अध्ययन
6.2.2. परिसंचरण सांख्यिकियों का अध्ययन
6.2.3. ग्रन्थ आरक्षण सूची का अध्ययन
6.2.4. सन्दर्भ प्रश्न अभिलेख का अध्ययन
6.2.5 पाठकों की अनुशंसाओं का अध्ययन
6.3. उपयोगकर्ता सर्वेक्षण
6.3.1. उपयोगकर्ता सर्वेक्षण से तात्पर्य
6.3.2. उपयोगकर्ता सर्वेक्षण की आवश्यकता
6.3.3. उपयोगकर्ता सर्वेक्षण के उद्देश्य
6.3.4. उपयोगकर्ता सर्वेक्षण के प्रकार
6.3.5. उपयोगकर्ता सर्वेक्षण का नियोजन '
6.3.5.1. सर्वेक्षण के उद्देश्यों को परिभाषित करना
6.3.5.2. सर्वेक्षण के क्षेत्र अथवा व्याप्तीकरण का निर्णय
6.3.5.3. सर्वेक्षण-काल का वरण
6.3.5.4 सर्वेक्षण करने की विधि का चयन
6.3.5.4.1 प्रश्नावली विधि
6.3.5.4.2. साक्षात्कार विधि
6.3.5.4.3. अवलोकन विधि
6.3.5.4.4. दैनन्दिनी विधि
6.3.5.4.5 पुस्तकालय अभिलेखों का सर्वेक्षण
6.3.5.4.6. प्रकरण- अध्ययन विधि
6.3.5.4.7 जाँच सूची विधि
6.3.6 उपयोगकर्ताओं का प्रादर्श लेने की विधियाँ
6.3.7 पूर्व परीक्षण
6.3.8. स्वयं पूर्ण परीक्षण
6.3.9. दत्त सामग्री का विश्लेषण
6.3.10.प्रतिवेदनीकरण
7. सारांश
8. अभ्यासार्थ प्रश्न
9. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रन्थसूची
1. विषय प्रवेश
आधुनिक पुस्तकालय सेवा पाठकोन्मुख है। पुस्तकालय के सभी क्रिया-कलाप-भवन, पाठ्य-सामग्री संग्रह, वर्गीकरण सूचीकरण, सन्दर्भ सेवा, आदि पाठक को केन्द्र में रखकर किये जाते हैं। यदि पुस्तकालय सेवा उपयोगकर्ताओं की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है तो सार्थक नहीं है। अत: आवश्यक है कि उपयोगकर्ताओं की सूचना सम्बन्धी आवश्यकताओं का पता लगाया जाये और पुस्तकालय सेवा से इसका ताल-मेल बैठाया जाये। यह भी आवश्यक है कि पुस्तकालय और सूचना सेवाओं को प्रभावशाली और सार्थक बनाने के लिये उपयोगकर्ताओं की आवश्यकताओं का विधिवत आकलन किया जाये।
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