पुस्तकालयों के नेटवर्क का गठन
अन्तरापुस्तकालयीन आदान कार्यक्रम की सफलता संघ सूचियों की उपलब्धता पर निर्भर करती है। संघ सूचियाँ परिपूर्ण, सर्वव्यापी और विश्वसनीय होनी चाहिये। अन्तरापुस्तकालयीन आदान के क्रियान्वयन के लिये जिसको काफी सीमा तक पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण का पर्याय माना जाता हैं, पुस्तकालयों के नेटवर्क का गठन किया जाता है। कुछ पुस्तकालय अन्तरापुस्तकालयीन आदान पर बहुत अधिक आश्रित हो जाते हैं और ग्रन्थार्जन में अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन भली प्रकार नहीं करते। यह उचित नहीं है।भारत में पुस्तकालयों का राष्ट्रीय नेटवर्क गठित करना आवश्यक है जिसके शीर्ष पर राष्ट्रीय केन्द्रीय पुस्तकालय होना चाहिये। 5 क्षेत्रीय नेटवर्क होने चाहिये। यदि कोई ग्रन्थ सम्बन्धित क्षेत्रीय नेटवर्क में उपलब्ध न हो, तब राष्ट्रीय केन्द्रीय पुस्तकालय में प्रयास करना चाहिये। यदि राष्ट्रीय केन्द्रीय पुस्तकालय में भी सम्बन्धित ग्रन्थ अनुपलब्ध हो तो देश के अन्य पुस्तकालयों में उसको खोजा जाना चाहिये। अन्तिम विकल्प के रूप में देश के बाहर के पुस्तकालयों की सहायता प्राप्त की जानी चाहिये।
9. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण की दृष्टि से भारतीय परिदृश्य
भारत में संसाधन सहभागीकरण के लिये क्षेत्रीय समूहों का गठन किया गया है। इस प्रकार के एक क्षेत्रीय सहकारी समूह का गठन सन् 1963 में चंडीगढ़ (संघीय क्षेत्र), हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और कश्मीर के विश्वविद्यालयीन पुस्तकालयों के ग्रन्थालयियों दारा किया गया है। मुम्बई नगर में इसी प्रकार का संघ "Bombay Scientific Librarians Association (BOSLA)' के नाम से कार्यरत है। दिल्ली में स्थानीय विश्वविद्यालयीन पुस्तकालयों द्वारा एक समूह का गठन किया गया था। यह समूह अब निष्क्रिय है। INSDOC द्वारा वैज्ञानिक आनुक्रमिक प्रकाशनों (Serials) की संघ सूचियों का संकलन किया गया है।। सन् 1973 में National Social Science Documentation Centre (NASSDOC) द्वारा Inter Library Resource Centre की स्थापना की गई। इसको जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और Indian Council of Social Science Research (ICSSR) ने संयुक्त रूप से प्रायोजित किया था। आरम्भ में दिल्ली के 12 पुस्तकालयों ने अपने अल्प उपयोग्य सामयिक प्रकाशनों और शासकीय प्रकाशनों की प्रतियाँ यहाँ निक्षेपित की। अब इस केन्द्र में दिल्ली के 30 स्थानीय पुस्तकालयों ने 10,000 से भी अधिक अपने ग्रन्थ निक्षेपित (Deposit) कर रखे हैं। यह संसाधन पुस्तकालयों और अध्येताओं को अध्ययनार्थ उपलब्ध हैं। NASSDOC द्वारा भी समाज विज्ञान सामयिक प्रकाशनों की संघ सूचियाँ संकलित की गई हैं।
10. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण नेटवर्क
अब पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण के लिये विभिन्न देशों में जालक्रमा (networks) का गठन किया जा रहा है। इनकी मुख्य विशेषतायें निम्नानुसार हैं:1. इन नेटवर्को में दो या अधिक पुस्तकालय समान इच्छाओं और उद्देश्यों की सम्पूर्ति हेतु सम्मिलित होते हैं;
2. इनमें एक स्रोत से दूसरे स्रोत के प्रति सूचना के स्वतन्त्र बहाव के लिये विमार्गीय
संचारण तन्त्र होता है; |
3. सूचना का वितरण अनेक स्वरूपों में हो सकता है; जैसे सूची पत्रक आदि।
उपरोक्त विशेषताओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण नेटवर्क सदस्य पुस्तकालयों के एक समूह की समान इच्छाओं की सन्तुष्टि हेतु कम्प्यूटर की सहायता से सूचना के वितरण के लिये विमार्गीय संचार सुविधाओं का एक स्वतन्त्र संगठन है इसके उद्देश्य निम्नानुसार हैं:
1. सदस्य पुस्तकालयों में संसाधन सहभागीकरण में उन्नति करना;
2. सूचना प्रस्तुतीकरण को केन्द्रीकृत करना; और
3. पुस्तकालयों में संचार अन्तराल (gap) को कम करना।
इसका महत्व और उपयोगिता निम्नानुसार हैं:
1. साहित्य और ज्ञान के विस्फोट पर वांड.गयात्मक नियन्त्रण (Bibliographic
Control);
2. मूल्यवान ग्रन्थों के क्रय में विरावृत्ति को रोकना;
3. ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में नवीन क्षत्रा के अंगीकरण को सुविधाजनक बनाना;
4. दत्त-सामग्री (Data) की चलनशीलता को उन्नत बनाना;
5. विशिष्ट सूचना केन्द्रों/पुस्तकालयों और अन्य प्रकार के पुस्तकालयों में सूचना के बहाव
को विकसित करना।
11. भारत में पुस्तकालय नेटवर्कीकरण और उसका विकास
क्षेत्र व्याप्तीकरण के आधार पर जालक्रम दो प्रमुख प्रकार के पाये जाते हैं:1. स्थानीय नेटवर्क (Local Area Networks)
2. विस्तृत क्षेत्र नेटवर्क (Wide Area Networks)
स्थानीय नेटवर्क किसी एक स्थान जैसे दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चैन्नई आदि तक सीमित रहता है। जबकि विस्तृत क्षेत्र नेटवर्क की संरचना सैकड़ो से हजारों किलोमीटर क्षेत्र की सेवार्थ की जाती है। संसाधन सहभागीकरण में इसका प्रयोजीकरण तीन क्षेत्रों में होता है
1. अन्तरापुस्तकालयीन आदान में;
2. सीडी रोम (CD Rom) डाटाबेस को परस्पर जोड़ने में; और
3. वांगयात्मक सूचना तक पहुँचने में।
भारत में इस प्रकार के जालक्रमों के कुछ प्रमुख उदाहरण निम्नानुसार हैं - i. Indonet (INDONET);
National Informatics Network (NICNET); iii. Education and Research Community Network (ERNET); iv. Science and Industry Research Network (SIRNET); और
V. Information Library Network (INFLIBNET)
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