भारतीय कॉपीराइट अधिनियम में श्रेणि
(ब) किसी भी कृति की पाद्य सामग्री को जनता में संप्रेषित करना।(स) किसी भी कृति (प्रकाशित) को जनता में जारी करना जो कि वितरण के लिए उपलब्ध न हो।
(द) किसी भी कृति का अनुवाद करना।
(ध) कृति पर कोई फिल्मांकन, या ध्वनि आबद्ध करना।
(न) किसी भी अनुवादित कृति के संदर्भ में उपरोक्त क्रियायें करना।
2.1 कॉपीराइट उल्लंघन संबंधी अपवाद
भारतीय कॉपीराइट अधिनियम के उपभाग 52 में, 5 श्रेणियों को उदधृत किया है जो कॉपीराइट उल्लंघन के परिधि में नहीं आते है:(अ) किसी कृति का छायांकन (व्यक्तिगत उपयोग, शोध, आलोचना, विवेचना, संप्रेषण
हेतु)
(ब) शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए छायांकन
(स) कार्यालयीय आवश्यकता हेतु छायांकन (न्यायिक, विधायिक इत्यादि)
(द) छायांकन जिसका मूल कृति से दूर का भी सम्बन्ध न हों तथा कॉपीराइट धारक | को किसी तरह का नुकसान न हो।
(ध) व्यक्तिगत मनोरंजन हेतु छायांकन
भारतीय कॉपीराइट अधिनियम के अनुसार, कॉपीराइट अधिकार का समयकाल लेखक के पूरे जीवन पर्यन्त तक रहता है एवं उसके मृत्यु के बाद 60 साल तक रहता है। जबकि अमेरिका में लेखक मृत्यु के बाद कॉपीराइट का अधिकार 50 वर्ष तक रहता है।
कॉपीराइट के वैधानिक अधिकार हेतु यह आवश्यक नहीं है कि कृति का कॉपीराइट निबन्धीकरण हो। कृति में किसी उचित स्थान पर कॉपीराइट संबंधी घोषणा कर देने से ही कॉपीराइट अधिकार मिल जाता है। हालांकि कॉपीराइट कार्यालय में कृति का निबन्धीकरण कराये बिना कोई भी लेखक किसी के विरूद्ध कॉपीराइट उल्लंघन के संबंध में कार्यवाही के लिए कोई दावा नहीं कर सकता।
भारत कॉपीराइट पर हुई दो अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का सदस्य है। वे दो समझौते है
(i) साहित्यिक एवं कलात्मक कृतियों के संरक्षण के लिए बर्न कन्वेन्शन, 1948 एवं
(ii) युनिवर्सल कॉपीराइट कन्वेन्शन (1952), भारतीय कॉपीराइट अधिनियम, 1957 इन दो कन्वेन्शन्स के विधानों के अनुरूप है।
आज विश्व में प्रौद्योगिकी विकास कॉपीराइट संरक्षण के लिए चुनौती बना हुआ है। विशेषकर इन्टरनेट सेवाओं में कॉपीराइट उल्लंघन की बारंबारता एवं समस्या को और जटिल बना दिया है।
3. गन्थ प्राप्ति अधिनियम (डिलीवरी आफ बुक्स एक्ट)।
पुस्तकालय का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य बौद्धिक कृतियों का रखाव एवं संरक्षण है। इसके लिए यह आवश्यक है कि देश में प्रकाशित प्रत्येक ग्रन्थों की प्रति पुस्तकालय में उपलब्ध हो। वित्तीय अभाव के कारण किसी भी पुस्तकालय के लिए यह संभव नहीं है कि देश में प्रकाशित प्रत्येक पुस्तक की प्रति खरीद सकें। अत: विभिन्न देशों में वैधानिक कानून बना पुस्तकालयों को मुक्त में वितरित करने की दिशा में अति महत्वपूर्ण कदम है। भारत में दो निम्नलिखित अधिनियम ग्रन्थ प्राप्ति के संबन्ध में हैं।(1) मुद्रण एवं ग्रन्थ पंजीकरण अधिनियम, 1867
(2) ग्रन्थ एवं समाचार पत्र प्राप्ति (सार्वजनिक पुस्तकालय) अधिनियम, 1954 3.1. मुद्रण एवं ग्रन्थ पंजीकरण अधिनियम, 1867
यह अधिनियम भारत सरकार (ब्रिटिश हुकुमते) दारा सन् 1867 मार्च में पारित किया गया। इसका क्रियान्वयन जुलाई 1867 से माना गया।
3.1.1 अधिनियम की मुख्य विशेषतायें:
(1) यह भारत के संपूर्ण क्षेत्र पर लागू है। (2) पुस्तकों के अंतर्गत समाचार पत्र एवं अन्य सामग्री जैसे कि मूल्य सूची, एवं अन्य सूचीसम्मिलित नहीं थी। (3) प्रत्येक प्रकाशित ग्रन्थ की तीन प्रतियाँ मुद्रणकर्ता सरकार को उपलब्ध करायेगा।
इन पुस्तकों को सरकार क्रमश: एक प्रति राष्ट्रीय पुस्तकालय कलकत्ता, कॉनेमरा सार्वजनिक पुस्तकालय, मद्रास, एवं एशिएटिक सोसायटी पुस्तकालय, मुम्बई को दे देती थी।
उपरोक्त अधिनियम हालांकि भारत सरकार का था लेकिन इसे राज्य स्तर पर पारित कराने का अधिकार राज्य सरकारों को दिया गया था। अत: वर्तमान समय में केन्द्रीय सरकार का कोई सीधा नियंत्रण नहीं रहा। इस अधिनियम में कोई दण्ड का प्राविधान नहीं था। अत: बहुत सारे प्रकाशक इस अधिनियम की अवहेलना कर पुस्तकों की प्रति सरकार के पास नहीं भेजते थे।
3.2. डिलीवरी आफ बुक्स एक्ट (सार्वजनिक पुस्तकालय) 1954
| भारत सरकार एक अधिनियम ओर अस्तित्व में लाया। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में पुस्तकालयों को प्रोत्साहित करना एवं विद्वता को प्रोत्साहित करने हेतु अच्छे पुस्तकालय स्थापित करना था। इन उद्देश्यों के पूर्ति हेतु प्रकाशित प्रत्येक ग्रन्थ की चार प्रतियाँ सरकार प्रकाशकों से प्राप्त कर भारत के चार पुस्तकालयों को दे देगी। ऐसी पुस्तकों की प्राप्त एक-एक प्रति राष्ट्रीय पुस्तकालय कलकत्ता, केन्द्रीय पुस्तकालय मुम्बई, कॉनेमरा सार्वजनिक पुस्तकालय, मद्रास एवं राष्ट्रीय केन्द्रीय पुस्तकालय (जिसे दिल्ली में स्थापित करना है) को दी जाती है।3.2.1. अधिनियम की मुख्य विशेषतायें
1. इस अधिनियम के अन्तर्गत प्रत्येक प्रकाशक की जिम्मेदारी है कि वह अपने पैसे से प्रत्येक प्रकाशित ग्रन्थ की प्रति राष्ट्रीय पुस्तकालय कलकत्ता, एवं अन्य तीन पुस्तकालयों को भेजेगा जो कि केन्द्रीय सरकार दारा अधिघोषित है। प्रत्येक पुस्तक प्रकाशन के तीस दिन के अन्दर भेज देना है।2. ग्रन्थों एवं समाचार पत्रों की ये प्रतियॉ उन कापियों के अतिरिक्त है जिन्हें मुद्रण एवं ग्रन्थ रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1867 के अंतर्गत देना है।
3. समाचार पत्रों के प्रकाशक भी निर्धारित चार पुस्तकालयों को अपने जिम्मेदारी पर मुफ्त में समाचार पत्र की प्रति भेजेंगे।
4. यह अधिनियम पूर्ण एवं स्वतंत्र है। जिसमें अधिनियम के नियम के उल्लंघन की स्थिति में 50 रु. दण्ड का प्रावधान है। यदि उल्लंघन पुस्तक के संदर्भ में है तो उसे | पुस्तक का मूल्य दण्ड स्वरूप अदा करना होगा।
5. यह केन्द्रीय सरकार को अधिनियम के अनुपालन हेतु नियम बनाने का अधिकार देता है।
6. इस अधिनियम को लागू एवं प्रशासित करने की जिम्मेदारी केन्द्रीय सरकार की है। जब कि मुद्रण एवं ग्रन्थ रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1867 केन्द्रीय अधिनियम होते हुये भी इसका क्रियान्वयन राज्य सरकार पर निर्भर है तथा प्रत्येक राज्य सरकार अपने राज्य की आवश्यकताओं के अनुसार इसमें संशोधन कर सकती है।
4. सारांश
। स्थिति लेखकों के अधिकारों को सुरक्षित रखने हेतु कॉपीराइट अधिनियम बनाया गया है। लेकिन वर्तमान समय में प्रौद्योगिकी में विकास हेतु कॉपीराइट उल्लंघन की संभावनायें अत्यधिक बढ़ गयी हैं जिस पर प्रभावी नियंत्रण के लिए कॉपीराइट कानून अधिनियम के स्वरूप में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता हैं। भारत में डिलिवरी ऑफ बुक्स एक्ट से सार्वजनिक पुस्तकालयों की में सुधार आया है। चुने हुए सार्वजनिक पुस्तकालयों में सभी पुस्तकें उपलब्ध होने के कारण ज्ञान संवर्धन एवं संरक्षण का कार्य अब आसान हो गया है। इलेक्ट्रानिक सूचना की वैधानिक समस्यायें जैसे कि कॉपीराइट, स्वामित्व, मूल्य, नियम एवं विभिन्न उपयोगों का अभी भी उचित निदान होना है। लेकिन कॉपीराइट कानून एवं डिलीवरी ऑफ बुक्स एक्ट को अधिक कठोर बनाने की आवश्यकता है ताकि कानून का उल्लंघन न हो।
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