1. कॉपीराइट अधिनियम की आवश्यकता एवं इसके महत्व पर प्रकाश डालिये?
3. किन परिस्थितियों में कॉपीराइट अधिनियम का उल्लंघन अपवाद स्वरूप नहीं मानाजाता। 4. भारत में वैधानिक ग्रन्थ अवाप्ति पद्धति के अंतर्गत विभिन्न अधिनियम) की विशेषताओं
का वर्णन कीजिये। 5. कॉपीराइट अधिनियम पर एक लेख लिखिए। 6. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रन्थसूची
1. अग्रवाल, श्याम सुन्दर, ग्रन्थालय तथा समाज, जयपुर, आर.बी.एस.ए. पब्लिशर्स,
1994.
2. व्यास, एस.डी, पुस्तकालय एवं समाज, जयपुर, पंचशील प्रकाशन, 1992.
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इकाई- 13 : पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण-अवधारणा, आवश्यकता और स्वरूप (Resource sharing- Concept, Need and Form)
उद्देश्य इस इकाई के निम्नलिखित उद्देश्य है1. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण की अवधारणा से परिचित कराना, 2. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण की आवश्यकताओं से परिचित कराना, 3. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण के उद्देश्यों से परिचित कराना, 4. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण के विभिन्न स्वरूपों की जानकारी देना, 5. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण की विभिन्न राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय योजनाओं से
परिचित कराना एवं 6. इस प्रसंग में भारतीय परिदृश्य से परिचित कराना। संरचना
1. विषय प्रवेश 2. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण के उद्देश्य 3. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण की आवश्यकता 4. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण से लाभ ।
पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण के विभिन्न स्तर 6. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण की सफलता के लिए पूर्व-अपेक्षित अनिवार्यताएँ 7. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण के मार्ग में बाधाएँ 8. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण के विभिन्न स्वरूप
8.1. सहकारी और केन्द्रीकृत ग्रन्थार्जन 8.2. सहकारी ग्रन्थ भण्डारण 8.3. सहकारी प्रस्तुतीकरण अर्थात् वर्गीकरण और सूचीकरण 8.4. पाठ्यसामग्री का अन्तरापुस्तकालयीन निक्षेप और विनिमय 8.5. अन्तरापुस्तकालयीन पाठक-पत्रक उपयोग 8.6. पुस्तकालय कार्मिक संसाधनों का विनिमय और सहभागीकरण 8.7. पुस्तकालय प्रचार में सहभागीकरण
8.8. अन्तरापुस्तकालयीन आदान 9. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण की दृष्टि से भारतीय परिदृश्य
10. पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण नेटवर्क
11. भारत में पुस्तकालय नेटवर्कीकरण और उसका विकास
11.1. इण्डोनेट (INDONET) 11.2. नेशनल इन्फार्मेटिक नेटवर्क (NICNET) 11.3. इन्फार्मेशन लायब्रेरी नेटवर्क (INFLIBNET)11.4. स्थानीय क्षेत्र नेटवर्क (Local Area Network) 12. अन्तर्राष्ट्रीय पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण 13. सारांश 14. अभ्यासार्थ प्रश्न
15. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रन्थसूची (v) अन्तरापुस्तकालयीन पाठक पत्रक उपयोग: (vi) अन्तरापुस्तकालयीन आदान (Inter-Library Loan): अर्थात् एक पुस्तकालय
दारा अपनी पुस्तकों, पत्रिकाओं और अन्य पाठ्य-सामग्री को अन्य पुस्तकालयों
को आदान पर देना; (vii) ग्रन्थात्मक और वाड.गमयात्मक (Documentary and Bibliographical)
अभिलेखों को नियन्त्रित करने के लिए कम्प्यूटरीकृत तन्त्रों को विकसित
करना; और (viii) जालक्रमों (Networks) का विकास आदि आते हैं। 2. पुस्तकालय कार्मिक संसाधनों का विनिमय और सहभागीकरण; एवं
3. पुस्तकालय प्रचार में सहभागीकरण।
8.1. सहकारी और केन्द्रीकृत ग्रन्थार्जन (Co-operative and Centralized Acquisition) |
(i) सहकारी ग्रन्थार्जन (Co-operative Acquisition)पाठ्य-सामग्री के अर्जन के सम्बन्ध में विभिन्न पुस्तकालयों में सहयोग स्थापित करके निश्चय ही सीमित संसाधनों दारा पाठकों की आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है। इस कार्यक्रम में कुछ पुस्तकालयों में अनुबन्ध के द्वारा, प्रत्येक पुस्तकालय किसी निश्चित विषय अथवा विषयों में विशिष्टीकरण प्राप्त करता है जिसके द्वारा यह समस्त पुस्तकालय सामूहिक रूप से समस्त विषयों में अपेक्षाकृत अधिक पाठ्य-सामग्री प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। इस योजना के अन्तर्गत स्थानीय पुस्तकालयों में से कोई एक "Encyclopedia Britannica" तो दूसरा “Encyclopedia Americana” का पूरा संघात (set) अर्जित करके स्थानीय उपयोगकर्ताओं को दोनों प्रकाशन उपयोगार्थ सुलभ कर उकता है। इसी प्रकार का सहयोग मूल्यवान सामयिक प्रकाशनों के सम्बन्ध में भी अपनाया जा सकता है। । सन् 1948 में लन्दन के 28 पुस्तकालयों दारा विषय विशिष्टीकरण की योजना अपनाई गई थी। सन् 1948 में ही संयुक्त राज्य अमेरीका में फार्मिंगटन प्लॉन नामक एक ऐसी योजना का श्रीगणेश 60 शोध पुस्तकालयों में किया गया जिसको सन् 1972 में बन्द कर दिया गया। भारत में भी स्थानीय स्तर पर इस प्रकार का सहकारी ग्रन्थार्जन का कार्यक्रम मुख्य रूप से महानगरों में अपनाया जा सकता है। सहकारी ग्रन्थार्जन की एक योजना भारत सरकार द्वारा संस्थापित पुस्तकालय परामर्शदात्री समिति ने अपना प्रतिवेदन वर्ष 1959 में प्रस्तुत किया था।
(ii) केन्द्रीकृत ग्रन्थार्जन (Centralized Acquisition)
एक विशाल पुस्तकालय तन्त्र में केन्द्रीकृत ग्रन्थ अर्जन करके भी धन, परिश्रम और समय की पर्याप्त बचत की जा सकती है। भारत में दिल्ली पब्लिक लॉयब्रेरी में जिसमें एक केन्द्रीय पुस्तकालय है और अनेक शाखा पुस्तकालय है इस प्रकार का सफलतापूर्वक केन्द्रीकृत ग्रन्थार्जन का कार्यक्रम चलाया जा रहा है। 8.2 सहकारी भण्डारण (Cooperative Storage)जी. जेफर्सन (G. Jefferson) सहकारी भण्डारण को सहकारी ग्रन्थ अर्जन का पूरक मानते हुए लिखते हैं, "सहकारी ग्रन्थार्जन का पूरक अर्थात् कुछ पुस्तकालयों दारा सामग्री का युक्तिसंगत अर्जन, सहकारी भण्डारण है। यह दोनों इतने अधिक सन्निकटता से जुड़े हैं कि इनको पृथक-पृथक करना कठिन है।" सभी पुस्तकालयों में साधारणतया कुछ पाठ्य-सामग्री कुछ समय पश्चात् उन पुस्तकालयों के पाठकों दारा उपयोग नहीं की जाती है। कुछ सामग्री गतिविधि (out-of-date) हो जाती है। ऐसी सामग्री व्यर्थ ही ग्रन्थागार में स्थान घेरती है। अत: ग्रन्थालयियों को ऐसी पाठ्यसामग्री को समय-समय पर निरसन (Weeding) करने की सलाह दी जाती है। यदि इस सामग्री को पूर्णत: नष्ट कर दिया जाये तो आगामी पीढ़ियों या कुछ विशिष्ट पाठकों को कैसे उपलब्ध किया जा सकेगा इसी कारण एक ऐसा केन्द्रीकृत भण्डारगृह स्थापित करना चाहिये जहाँ विभिन्न पुस्तकालय अपनी ऐसी पाठ्यसामग्री को भेज सकें। इस अवधारणा के पीछे न्यून व्यय पर भण्डारण का विचार प्रमुख रूप से कार्यरत है। | ग्रेट ब्रिटेन में सहकारी भण्डारण की इस योजना को अपनाया गया है। संयुक्त राज्य अमरीका में इस प्रकार की तीन प्रमुख योजनाएँ कार्यरत है।
(1) New England Depository Library in Boston Area,
(2) Hampshire Inter Library Centre at Amherst; और
(3) Centre for Research Libraries जिसकी स्थापना मार्च 1949 में The Midwest Inter Library Centre के नाम से की गई थी। भारत सरकार दारा संस्थापित पुस्तकालय परामर्शदात्री समिति ने भी अपने प्रतिवेदन में जीर्ण-शीर्ण, गतिविधि और उपयोगहीन पाठ्यसामग्री को रखने के लिये प्रत्येक राज्य में एक 'केन्द्र स्थापित करने का सुझाव दिया गया है जिसको पुस्तक खत्ती (Book bin) अथवा पुस्तक आगार (Book reservoir) का नाम दिया गया है।
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