केन्द्रीकृत और सहकारी सूचीकरण की कई योजनाएँ विदेशों में मुख्यत: संयुक्त राज्य अमरीका में अपनाई गई इनमें कुछ प्रमुख नाम निम्नानुसार है: |
1. एच. डब्ल्यू विल्सन कं. द्वारा प्रस्तुत सूचीपत्रक2. लॉयब्रेरी ऑफ कांग्रेस द्वारा प्रस्तुत सूचीपत्रक
3. स्रोत-पर सूचीकरण (Cataloguing-in-Source) (1958)
4. प्रकाशन-में-सूचीकरण (Cataloguing-in-Publication) (1971)
5. मार्क प्रायोजना (MARC Project)
ग्रेट ब्रिटेन यूरोप के अन्य देशों में भी 'प्रकाशन-में-सूचीकरण' और 'मार्क प्रायोजना' का क्रियान्वयन किया जा रहा है। भारत में अभी तक ऐसी कोई योजना क्रियान्वित नहीं की गई है। यद्यपि रंगनाथन ने सन् 1950 में ही अपने ग्रन्थ “Library Development Plan” में ऐसी एक योजना पुरः जन्म वर्गीकरण और सूचीकरण (Prenatal Classification) के नाम से प्रस्तुत की थी। इसी के आधार पर संयुक्त राज्य अमरीका में उपरोक्त 'स्रोत-पर-सूचीकरण' और 'प्रकाशन-में-सूचीकरण' नामक प्रयोग किये गये। विभिन्न पुस्तकालयों के पारस्परिक सहयोग से संघ सूची (Union Catalogue) का भी संकलन किया जा सकता है जो संसाधन सहभागीकरण के लिये एक आवश्यक और उपयोगी उपकरण है।
8.4. पाठ्य-सामग्री का अन्तरापुस्तकालयीन निक्षेप (Deposit) तथा विनिमय (Exchange)
श्रेष्ठ प्रयासों तथा सतर्कता के बावजूद पुस्तकालयों में कुछ ऐसी पाठ्य-सामग्री आ जाती है जो उनमें उपयोग नहीं की जाती। यदि ऐसी पाठ्य-सामग्री को ऐसे पुस्तकालयों में भेज दिया जाये जहाँ उनका उपयोग होने की सम्भावना हो तो पुस्तकालय विज्ञान के समस्त सूत्रों को सन्तुष्ट किया जा सकता है। इस प्रकार के आयोजन में किसी पुस्तकालय को किसी प्रकार की हानि होने की भी सम्भावना नहीं है। इस प्रकार निक्षेप तथा विनिमय द्वारा पारस्परिक सहयोग में वृद्धि होकर पाठ्य-सामग्री के उपयोग की सम्भावनाएं बढ़ती हैं। संयुक्त राज्य अमरीका में इसको अनेक पुस्तकालयों दारा उपयोग में लाया जा रहा है।8.5. अन्तरापुस्तकालयीन पाठक पत्रक उपयोग ।
कुछ पुस्तकालयों ने प्रवासी पाठकों को उनके नगर के ग्रन्थालयों दारा प्रदत्त पाठक पत्रकों (Readers Tickets) पर ग्रन्थ निर्गम (issue) की सुविधा प्रदान करके पाठकों की सेवा करने और पुस्तकालय सहयोग में नया कीर्तिमान स्थापित किया है। इस प्रकार की सेवा तथा सहयोग दारा उपयोगकर्ताओं को यात्राकाल में पठन-पाठन सुविधाएँ प्राप्त हो जाती हैं।8.6. पुस्तकालय कार्मिक संसाधनों का विनिमय और सहभागीकरण
कार्मिकों की कार्यक्षमता में आशातीत वृद्धि करने, उनके बीच सौहार्द्र, सद्भावना, सहयोग तथा प्रेम की अभिवृद्धि करने, समांगता (Monotony) में परिवर्तन करने और उनके दृष्टिकोण को विस्तृत करने के लिये अन्तरापुस्तकालयीन कार्मिकों का विनिमय भी पर्याप्त रूप से सहायक सिद्ध होता है। विशेषकर हमारे देश में जहाँ संसाधनों की कमी है इस प्रकार का सहभागीकरण आवश्यक है।। उपरोक्त योजना को क्रियान्वित करना निश्चय ही एक व्ययसाध्य योजना होगी। कार्मिकों को स्थानान्तरण से कुछ असुविधा होना ही स्वाभाविक है। कार्य तथा परिस्थितियों में परिवर्तन से भी कुछ असुविधा हो सकती है।
8.7. पुस्तकालय प्रचार में सहभागीकरण
| जिस प्रकार प्रचार आधुनिक व्यापार का आधार है, इसी प्रकार प्रचार पुस्तकालय के लिये भी आवश्यक समझा जाता है। प्रचार दो प्रकार से हो सकता है - वैयक्तिक और सामूहिक सामूहिक प्रचार में विभिन्न पुस्तकालय परस्पर सहयोग करके प्रचार के अत्यधिक माध्यमों का उपयोग कर सकते है और विशाल स्तर पर प्रचार कार्य करते हुए भी प्रत्येक पुस्तकालय पर उसका व्यय अल्प ही रह सकता है।8.8. अन्तरग्रन्थालयीन आदान (Inter-library Loan)
। विभिन्न पुस्तकालयों में संसाधन सहभागीकरण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण, उपयोगी और व्यावहारिक स्वरूप अन्तरापुस्तकालयीन आदान माना जाता है। यहाँ तक कि अन्तरापुस्तकालयीन आदान को पुस्तकालय संसाधन सहभागीकरण का पर्याय भी मान लिया जाता है। अन्तरापुस्तकालयीन आदान से तात्पर्य है विभिन्न पुस्तकालयों द्वारा उपयोगकर्ताओं के उपयोगार्थ परस्पर ग्रन्थों का आदान-प्रदान करना। अब पुस्तकालय तन्त्र (Library System) स्थापित करने पर बल दिया जाता है। पुस्तकालय तन्त्र से तात्पर्य है, पुस्तकालयों का जाल क्रम (Network) जिसमें विभिन्न पुस्तकालय परस्पर सम्बद्ध रहते हैं न कि अलग- अलग। अन्तरापुस्तकालयीन आदान की आवश्यकता अन्तरापुस्तकालयीन आदान की आवश्यकता साधनों की सीमितता, पाठ्य-सामग्री का सर्वाधिक उपयोग और उपयोगकर्ताओं की माँगों को पूर्णतया सन्तुष्ट करने के आधार पर निहित है। अनेक ग्रन्थों के दुर्लभ (Rare) और अप्राप्य (Out-of-Print) होने के कारण भी अन्तरापुस्तकालयीन आदान आवश्यक हो जाता है। इस प्रकार के आदान की आवश्यकता वैज्ञानिक, तकनीकी और शोध पुस्तकालयों में सर्वाधिक प्रतीत होती है।अन्तरापुस्तकालयीन आदान के लिये पूर्व अपेक्षित अनिवार्यतायें
1. इसके लिये सर्वप्रथम आवश्यकता अन्तरापुस्तकालयीन आदान हेतु विभिन्न पुस्तकालयोंकी सहमति है। भारत में इस प्रकार की सहमति का अभाव पाया जाता है। साधारणतया वे अपने अलभ्य और मूल्यवान ग्रन्थों को अपने पुस्तकालय से बाहर भेजने के लिये सहमत नहीं होते। ऐसी स्थिति में उनकी फोटोस्टेट और अणुचित्र (Microfilm) प्रतियाँ भेजने की व्यवस्था होनी चाहिये।
2. नियमों का निर्माण : इस प्रकार के आदान के लिये सर्वमान्य नियमों का निर्माण दूसरी आवश्यकता है। इन नियमों के द्वारा आदान माँगने वाले और आदान पाने वाले पुस्तकालयों का उत्तरदायित्व और कर्तव्य सुनिश्चित होता है। उदाहरणार्थ पुस्तक के जाने- आने का डाक-व्यय कौन सा पुस्तकालय वहन करेगा? पुस्तक की सुरक्षा के प्रति क्या उत्तरदायित्व होगा? आदि। भारतीय विशिष्ट पुस्तकालय संघ- आयसलिक
(IASLIC) दारा इस प्रकार के नियमों का निर्माण किया गया है।
3. सरकार दारा अन्तरापुस्तकालयीन आदान हेतु पर्याप्त सुविधायें प्रदान करना चाहिये।
उदाहरणार्थ डाक-व्यय में रियायत देना चाहिये।
4. पुस्तकालय में पर्याप्त कार्मिकों की नियुक्ति करना चाहिये और फोटो- स्टेट तथा अणु
चित्र प्रतियाँ निर्मित करने के लिये उपकरणों का प्रबन्ध होना चाहिये। अन्तरापुस्तकालयीन आदान के उपकरण
यदि अन्तरापुस्तकालयीन आदान का संचालन सफलतापूर्वक करना है तो कुछ उपकरणों का निर्माण भी आवश्यक है। इनके द्वारा वांछित पाठ्य-सामग्री का स्थान निर्धारण होता है। साधाराणतया इन उपकरणों का निर्माण भी सहकारिता के आधार पर किया जाता है। प्रमुख उपकरण निम्नानुसार हैं
1. गन्थ-सन्दर्भ-सूचियाँ (Bibliographies)
| ग्रन्थ-सन्दर्भ-सूचियाँ ग्रन्थों के सम्बन्ध में सूचना प्रदान करती हैं।राष्ट्रीय ग्रन्थ-सन्दर्भसूचियाँ (National Bibliographies) तथा अन्य क्षेत्रीय ग्रन्थ-सन्दर्भ-सूचियाँ अन्तरापुस्तकालयीन आदान हेतु विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होती हैं। भारतवर्ष में भारतीय राष्ट्रीय ग्रंथसूची (Indian National Bibliography) का प्रकाशन सन् 1957 में आरम्भ किया गया है।2. संघ सूचियाँ (Union Catalogues)
संघ सूची से तात्पर्य किसी क्षेत्र के विभिन्न पुस्तकालयों की सम्मिलित सूची से है। संघ सूची का निर्माण सहकारिता के आधार पर भी हो सकता है। रंगनाथन ने संघ सूची की परिभाषा अग्रानुसार की है, "दो या दो से अधिक पुस्तकालयों के ग्रन्थों की सूची जिसमें उन समस्त पुस्तकालयों के नाम दिये हो जहाँ उन ग्रन्थों के प्रतियाँ प्राप्त की जा सके। एक संघ सूची में समस्त प्रकार की पाठ्य-सामग्री सम्मिलित की जा सकती है अथवा एक प्रकार की पाठ्य-सामग्री तक सीमित रखी जा सकती है।"
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