वनस्पति शास्त्र के दृष्टिकोण से Seed (बीज) शब्द का प्रयोग
व्याख्या यहां Old age पद का प्रयोग छः मुख्य वर्गों के संदर्भ में किया गया है। किन्तु इसका संबंधित मुख्य वर्गीकरण वर्ग के अनुसार अर्थ भिन्न है। G,1,K,L में इसका प्रयोग एक विशिष्ट वर्ग (Special) के रूप में हुआ है। ये विशिष्ट वर्ग भी मुख्य वर्ग के रूप में प्रयोग में लाये जाते है। G= Biology (जीव विज्ञान) में G9E का अर्थ है सामान्य जीव की वृद्धावस्था। l=Botany (वनस्पति विज्ञान) में 19E का अर्थ विभिन्न वनस्पतियों की वृद्धावस्था। K= Zoology (प्राणिशास्त्र) में K9E का अर्थ है विभिन्न प्राणियों/जन्तुओं की वृद्धावस्था। L=Medicine (चिकित्सा शास्त्र) में L9E का अर्थ है वृद्ध मानव की चिकित्सा का वैशिष्ट्य। S= Psychology (मनोविज्ञान) के [P] पक्ष में इसका अर्थ है वृद्धजन का मनोविज्ञान। Y= Sociology (समाज शास्त्र) के [E] पक्ष में इसका अर्थ है वृद्धावस्था से संबंधित समारोह।(x) Seed | [P2], 178, J [P], 38,48,58,68,78
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व्याख्या: वनस्पति शास्त्र के दृष्टिकोण से Seed (बीज) शब्द का प्रयोग |=Botany (वनस्पति शास्त्र) के [P2] पक्ष में वनस्पतियों के बीज को सूचित करता है। जबकि J= Agriculture (कृषि शास्त्र) में इसका [P] पक्ष के रूप में तो प्रयोग किया गया है किन्तु इसी पक्ष में यह पांच अर्थों में प्रयोग में लाया गया है अर्थात् 38' उस फसल की कृषि को सूचित करता है जिसका बीज खाद्य के रूप में उपयोग में लाया जाता है। जैसे, चावल, गेहूं। '48' उस फसल की कृषि को सूचित करता है जिसका बीज ताजगी प्रदान करता है- जैसे, कॉफी। '58' उस फसल की कृषि को सूचित करता है जिसके बीज का तेल उपयोग में लाया जाता है। '68' उस फसल की कृषि को सूचित करता है जिसके बीज औषधि के रूप में उपयोग में लाये जाते हैं। '78' उस फसल की कृषि को सूचित करता है जिसका बीज के ऊपर का रेशा कपड़ा बनाने के लिये उपयोग में लाया जाता है। जैसे, रूई।
इस प्रकार अनुक्रमणिका का उपयोग करते समय सभी पदों के संदर्भ को ध्यान में रखना होगा। 8. परिशिष्ट : उपयोगिता ।
विबिन्दु वर्गीकरण के पुनर्मुद्रित छठे संस्करण (1963) के आरंभिक
पृष्ठों के तुरंत बाद पृष्ठ 19 से 28 तक एक परिशिष्ट दिया गया है। छठे संस्करण में किये गये अनेक संशोधन, परिवर्तन एवं मुद्रण संबंधी त्रुटियों का सुधार इस परिशिष्ट में सम्मिलित किये गये हैं।भाग 1 (नियम भाग) तथा भाग 2 की अनुसूचियों में किये गये परिवर्तनों, संशोधनों एवं त्रुटियों के सुधारों का उल्लेख उनके पृष्ठों का संदर्भ देकर किया गया है। नियम भाग पृष्ठ 1.51 पर भौगोलिक एकलों से संबंधित नियम 40 में किये गये संशोधन (परिवर्तन) के अनुसार भौगोलिक एकल के चार खण्ड विशेष ध्यान देने योग्य हैं (परिशिष्ट पृ.20)। पृष्ठ 1.113 पर मुख्य वर्ग T= Education के [E] पक्ष के लिये [2P] पक्ष प्राप्त करने से संबंधित नियम T3 | पृष्ठ 1.115 पर मुख्य वर्ग V= History के [E] पक्ष की एकल संख्या 19 = Foreign Policy से संबंधित नियम V3191 में किये गये परिवर्तन अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
इसके अतिरिक्त भाग 2 (पृ. 2.88) में M3 से लेकर कॉलम एक के अन्त तक किये गये परिवर्तन भी विशेष ध्यान देने योग्य हैं। यहां M7= Textiles के पक्ष-परिसूत्र एवं अनुसूची में आधारभूत परिवर्तन किया गया है। इस परिवर्तन का उल्लेख परिशिष्ट के पृष्ठ 27 पर किया गया है। | इस प्रकार प्रायोगिक वर्गीकरण की दृष्टि से इस परिशिष्ट का विशेष महत्व है। 9. सारांश
इस इकाई में विबिन्दु वर्गीकरण के पुनर्मुद्रित छठे संस्करण (1963) के प्रायोगिक उपयोग से संबंधित निम्नलिखित बिन्दुओं पर मुख्य रूप से विचार किया गया है: (1) विबिन्दु वर्गीकरण का पुनर्मुद्रित छठा संस्करण तीन भागों में विभाजित किया गया
है- जैसे भाग 1 : नियम, भाग 2 : वर्गीकरण अनुसूचियां एवं भाग 3 : वरेण्य ग्रन्थ एवं धार्मिक ग्रन्थों की अनुसूचियां;
(2) भाग 1 : नियम, प्रायोगिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है
क्योंकि इस भाग में आवश्यक परिभाषाओं, प्रायोगिक वर्गीकरण से संबंधित सामान्य नियमों, अनुसूचियों के प्रयोग संबंधी नियमों आदि का उल्लेख है। इस भाग में वर्गीक, ग्रंथांक आदि के निर्माण की विधि एवं मुख्य वर्गों के पक्ष-परिसूत्रों के प्रायोगिक उपयोग के बारे में समझाया गया है। इसी भाग में सामान्य एकलों, काल एकलों के प्रायोगिक पक्ष को स्पष्टकिया गया है। (3) भाग 2 वर्गीकरण अनुसूचियाँ में वर्गीकरण की विभिन्न अनुसूचियों का उल्लेख है
जैसे सर्वसामान्य एकलों, स्थान एकलों, भाषा एकलों व विभिन्न विषयों की अनुसूचियां आवश्यक पक्ष-परिसूत्रों सहित । इसी भाग में उपयुक्त स्थानों पर विशिष्ट अनुक्रमणिकाओं का उल्लेख है- जैसे, भौगोलिक अनुक्रमणिका, वनस्पतियों के प्राकृतिक वर्गों की अनुक्रमणिका एवं प्राणियों के प्राकृतिक वर्गों की अनुक्रमणिका।
ये अनुक्रमणिकायें प्रायोगिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। (4) भाग 3 : वरेण्य ग्रन्थों एवं धार्मिक ग्रन्थ में वरेण्य एवं धार्मिक ग्रन्थों के निर्मित वर्गीक दिये गये हैं, साथ ही इनकी वर्णानुक्रम में एक अनुक्रमणिका दी गई है। (5) इस पद्धति का अंकन मिश्रित है; अर्थात् इसमें विभिन्न अंकों एवं प्रतीकों का प्रयोग किया गया है, जैसे, भारत-अरब अंक, रोमन वर्णमाला के लघु अक्षर, रोमन वर्णमाला के दीर्घ अक्षर, ग्रीक अक्षर तथा कुछ विरामादि चिन्ह। इन अंकनों व प्रतीकों का जिस-जिस प्रयोजन के लिये उपयोग किया गया है उसको भी स्पष्ट किया गया है।
(6) पांच मूलभूत श्रेणियों के प्रायोगिक पक्ष को उनके आवर्तनों एवं स्तरों सहित समझाया गया है।
(7) वर्गीकरण के प्रायोगिक पक्ष को समझाने के लिये वर्गीक बनाने की चरणबद्ध प्रक्रिया को उदाहरण देकर स्पष्ट किया गया है।(8) भाग 2 के अन्त में उल्लिखित अनुसूचियों की अनुक्रमणिका के प्रायोगिक उपयोग की विधि को उदाहरण देकर समझाया गया है ताकि वर्गाकार इसके प्रायोगिक पक्ष की जटिलता को सरलता से समझ सके।
(9) इस पुस्तक के आरंभ में पृष्ठ 19 से 28 तक दिये गये परिशिष्ट में छठे संस्करण
में किये गये संशोधनों, परिवर्तनों एवं मुद्रण संबंधी त्रुटियों का उल्लेख हैं, यह परिशिष्ट प्रायोगिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसका अवलोकन करना
आवश्यक है।
10. अभ्यासार्थ प्रश्न । 1. विबिन्दु वर्गीकरण संस्करण छ: पुनर्मुद्रित (1963) के भाग 1 का प्रायोगिक दृष्टि से
महत्व स्पष्ट कीजिए। 2. विबिन्दु वर्गीकरण के भाग 2 में उल्लिखित विशिष्ट अनुक्रमणिकाओं का प्रायोगिक
उपयोग बताइये।
3. विबिन्दु वर्गीकरण की वैश्लेषी-संश्लेषणात्मक प्रक्रिया को चरणबद्ध क्रम में उदाहरण
देकर स्पष्ट कीजिए। 4. किसी भी मुख्य वर्ग के पक्ष परिसूत्र का मूलभूत श्रेणियों के संदर्भ में प्रायोगिक दृष्टि से
विश्लेषण कीजिये। 5. अनुसूचियों की अनुक्रमणिका की सहायता से निम्नलिखित एकल पदों के वर्गीक बनाइये
(i) Alien (ii) Breach of contract (iii) Etiology (iv) Management (v) Pathology (vi) Public Nuisance (vii) Morphology (viii) Nervous System (ix) Winter
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