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खारवेल की तिथि तथा उसकी उपलब्धियों के बारे में आप क्या जानते है?

Friday, 7 December 2018
खारवेल की तिथि तथा उसकी उपलब्धियों के बारे में आप क्या जानते है?

कलिंग की पूर्वस्थिति—कलिंग का सम्राट खारवेल एक इतिहास प्रसिद्ध व्यक्ति है। उसका व्यक्तित्व आकर्षित एवं पराक्रमी रहा है। जहाँ तक कलिंग के इतिहास का प्रश्न है। इसके बारे में कहा जाता है कि इसका इतिहास बहुत ही अनिश्चित है। ऐसा माना जाता है। कि अशोक से पूर्व कलिंग मौर्य साम्राज्य के अन्तर्गत नहीं था। बाद में अशोक ने इसे विजित कर इसे मौर्य साम्राज्य का अंग बनाया। नन्द शासन में निश्चित रूप से यह मगध साम्राज्य के अधीन था। नन्द शासकों द्वारा कलिंग में एक नहर का निर्माण कराने का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। अशोक के बाद कलिंग का इतिहास फिर अन्धकारपूर्ण रहा।

 हाथी गुम्फ लेख की खोज के पश्चात् कलिंग का इतिहास फिर प्रकाश में आया। कलिंग के इतिहास की जानकारी देने वाला यह अभिलेख उड़ीसा के पुरी जिले में भुवनेश्वर के समीप उदयगिरि की पहाड़ी में स्थित है। सबसे पहले इस पर स्टरलिंग द्वारा सन् 1825 में खोज से सामने आया। 1825 के बाद से इतिहासकार इस पर और अधिक जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करते रहे हैं। यह अभिलेख ही खारवेल के शासनकाल में हुई महत्त्वपूर्ण घटनाओं की जानकारी प्राप्त करने का मुख्य साधन स्रोत है। यह अभिलेख लौकिक संस्कृत भाषा में है तथा इसमें इस कलिंग नरेश के समय की वृहद जानकारी मिलती है।

ऐसा माना जाता है कि अभिलेख को खारवेल ने अपने शासनकाल के 13वें- 14वें वर्ष में अंकित कराया था। | खारवेल की वंश परम्परा उदयगिरि की पहाड़ी में प्राप्त अभिलेख के आधार पर यह माना जाता है कि खारवेल चेदिर चेत वंश का तृतीय राजा था। सन् 1883 ई. में प्रथम बार डॉ. भगवान लाल इन्द्र ने इस अभिलेख का अनुवाद कर अपना मत प्रकाशित किया। डॉ. इन्द्र के अनुसार खारवेल के पिता वृद्धराज एवं पितामह क्षेमराज थे । परन्तु यह मत सन्देह से घिरा हुआ है। कुछ इतिहासकार डॉ. इन्द्र के इस मत से सहमत नहीं हैं। प्राप्त अभिलेख में खारवेल के लिए ऐरा, महाराज, राजर्षि, कलिंगाधिपति एवं महामेघवाहन आदि नामों से सम्बोधित किया गया है। डॉ. बरुआ व पाण्डेय के मतानुसार खारवेल के विषय में जैसाकि पुराणों में उल्लेख है वह मेघवंशी था। परन्तु इस मत पर भी इतिहासकारों में मतैक्य नहीं हैं।

डॉ. सिन्हा का कथन है कि पुराणों में वर्णित मेघवंश का सम्बन्ध कौशल राज्य से या कलिंग से नहीं वह उसका शाब्दिक अर्थ इन्द्र के समान पराक्रमी' लगाते है। | खारवेल का प्रारम्भिक जीवन बचपन में खारवेल को उच्च कोटि की शिक्षा दी गई थी। 15 वर्ष की उम्र तक खारवेल ने खेलकूद एवं व्यायाम द्वारा अपने बलिष्ठ शरीर का निर्माण किया तथा पढ़ना-पढ़ाना, लिखाई, गणित, अर्थशास्त्र तथा कानून के क्षेत्र में निपुणता प्राप्त कर युवराज का पद प्राप्त कर लिया एवं 9 वर्ष तक युवराज रहा । एवं शासन के संचाल में सहायता दी। और 24 वर्ष की उम्र में ही खारवेल ने स्वतंत्र रुप से राजा का पद प्राप्त किया। तथा महाराजा की उपाधि धारण की।

विजय अभियान कलिंगाधिपति खारवेल ने सम्राट बनने के पश्चात् आक्रमण का रास्ता अपनाया। शासन सँभालने के दूसरे वर्ष में ही खारवेल ने सातवाहन सम्राट शतकर्णि प्रथम पर सैन्य शक्ति सहित आक्रमण कर दिया एवं कृष्णा नदी पर निर्मित्त असिक नजर को क्षत-विक्षत कर दिया । इतिहासकारों के मतानुसार यह असिक नगर ‘मूसिक' था जो कृष्णा एवं मूसि नदियों के संगम पर स्थित था। डॉ. बरुआ ने भी इस नगर के सम्बन्ध में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि असिक नगर अस्सिकों की राजधानी थी जो गोदावरी नदी घाटी में स्थित था । सम्राट खारवेल के आक्रमण के जवाब में शतकर्णि ने युद्ध किया या नहीं इसका अभिलेख में कोई भी जिक्र नहीं है और न किसी इतिहासकार ने ही इस पर टिप्पणी की है। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि सम्राट खारवेल मूसिक को ध्वस्त कर लौट आया था। खारवेल ने अपने शासनकाल के चौथे वर्ष में राष्ट्रकों व भोजकों को पराजित किया।

इसके बाद कुछ वर्ष तक वह अपने शासन कार्य में व्यस्त रहा । परन्तु अपने राज्य-काल के आठवें वर्ष में उसकी विजयी महत्वाकाँक्षा जगी और उसने गौरव गिरि पर हमला कर दिया। और उसे नष्ट कर मगध की राजधानी राजगृह पर चढ़ाई की एवं राजधानी राजगृह एवं इसके निकटवर्ती क्षेत्र की जनता को आतंकित किया जनता काफी पीड़ित थी। पर जनता की इस पीड़ा को राजगृह नरेश दूर करने में असमर्थ रहा और वह अपनी जान बचाकर राजगृह से मथुरा की ओर भाग गया। खारवेल ने भागते हुए राजगृह नरेश का पीछा नहीं किया और फिर वह अपनी राजधानी को वापस आ गया। कुछ इतिहासकार राजगृह नरेश को डिमेट्रियस मानते हैं। लेकिन ये अनुमान सत्य से परे है। क्योंकि डिमेट्रियस, खारवेल का समकालीन नहीं था । वरन् इसके बहुत पूर्व का है। इस काल का एक टूटा-फूटा अभिलेख मिला है।

इसमें जो पढ़ने में आता है। उससे किसी यवन राज्य का उल्लेख मालूम होता है। राजगृह से लौटकर खारवेल ने एक विजय प्रासाद का निर्माण कराया जिस पर कुल लागत 38 लाख रुपये आयी। । विजय प्रासाद का निर्माण कराने के पश्चात् वह फिर से विजय अभियान पर निकल पड़ा। हाथी गुम्फ अभिलेख में वर्णन है कि खारवेल ने अपने शासनकाल के दसवें वर्ष में उत्तर की ओर प्रस्थान किया। तथा सन्धि एवं विजय द्वारा महान् विजय प्राप्त की। हाथी गुम्फ अभिलेख की भाषा अस्पष्ट होने के कारण यह जानकारी नहीं मिलती कि इसने किस-किस सम्राट से युद्ध किये लेकिन इस बात की जानकारी अवश्य मिल जाती है कि कुछ को उसने परास्त किया तथा कुछ के साथ सन्धि की नीति अपनाई । विजयश्री उसका साथ दे रही थी।

अत: इससे उत्साहित होकर अपने शासनकाल के 11वें वर्ष में उसने पीथुड़ नगर को नष्ट कर वहाँ गर्दभों से हल जुतवाये । खारवेल ने पराजित सम्राटों से मणि वे बहुमूल्य रत्न प्राप्त किये। एवं 13 सौ वर्ष प्राचीन तामिल संघ को नष्ट किया । राज्यकाल का 12वाँ वर्ष खारवेल की विजयों का सुनहरी समय था । वह अपने शासनकाल के प्रत्येक वर्ष को अमूल्य मानकर विजय की तृष्णा में इधर-उधर नजर दौड़ा रहा था । खारवेल ने पुनः मगध की तरफ ध्यान दिया और उससे विजित करने हेतु सैन्य बल सहित प्रस्थान किया। उसकी सेना में भारी संख्या में हाथी और घोड़े थे, मगध नरेश इस सैन्य शक्ति से काफी भयभीत हो गया। खारवेल ने मगध सम्राट वृहस्पतिमित्र को आत्म समर्पण के लिए बाध्य किया। मगध सम्राट ने खारवेल की अधीनता स्वीकार कर ली । इस तरह खारवेल ने मगध से विपुल धन सम्पदा प्राप्त की।

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